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अंतरराष्ट्रीय रेत कला उत्सव में बिहार के मधुरेन्द्र का परचम, शार्क देशों के बीच इंटरनेशनल अवार्ड जीता

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पद्मश्री सुदर्शन पटनायक ने मधुरेन्द्र की कलाकृतियों की सराहना करते सेल्फी भी ली थी

मोतिहारी, पूर्वी चंपारण : ओडिशा के चंद्रभागा समुद्र तट पर पर्यटन विभाग द्वारा आयोजित 1 से पांच दिसंबर तक आयोजित हुए पांच दिवसीय अंतरष्ट्रीय रेत कला उत्सव में अपनी विशेष सैंड आर्ट प्रदर्शन कर पूर्वी चंपारण जिले के घोड़ासहन बिजबनी गांव निवासी युवा रेत कलाकार मधुरेन्द्र कुमार ने बिहार का नाम अंतराष्ट्रीय फलक पर रौशन किया हैं। इन्होंने शार्क देशों के बीच से इंटरनेशनल अवार्ड जीत कर दुनियां भर में अपनी कला का परचम लहराया हैं। बता दे कि उत्सव के समापन अवसर पर शनिवार की देर संध्या में ओड़िसा सरकार के गठित टीम द्वारा मधुरेन्द्र द्वारा बनायी गयी सभी सैंड आर्ट की पांचों कलाकृतियों को चिन्हित कर प्रथम पुरस्कार के लिए चयन कर लिया। सैंड आर्टिस्ट मधुरेन्द्र को कोणार्क फेस्टिवल के मुख्य मंच से मधुरेन्द्र को तीस हजार का चेक, प्रशस्ती पत्र, स्मृति चिन्ह व पुष्वगुच्छ देकर सम्मानित किया गया।

कलाकृतियों से समाज को संदेश

बता दे कि यह युवा कलाकार मधुरेन्द्र रोड पर फेंके हुए कचरे से उत्पन्न दुष्प्रभाव व गुटखों के रैपर से अपनी कलाकृतियां बनाकर लोगों को नशीले चीजों के सेवन से बचने का संदेश देतें हैं, इतना ही नहीं ये बालू पर महापुरुषों की जयंती से लेकर श्रंद्धाजलि तक, देश-दुनिया की धरोहर और विरासतों की आकर्षक आकृति, देवी-देवताओं की प्रतिमा, मानव स्वाथ्य, नशा का दुष्प्रभाव, मधनिषेध, धूम्रपान निषेध, बेटी बचाओं, बेटी पढ़ाओ, नारी उत्पीड़न, मजबूर-बेबस, हिंसा, शोषण, बाल मजदूर, भ्रूण हत्या, जल संरक्षण, जल, वायु और मृदा प्रदूषण, पशु-पंछी संरक्षण, जनसंख्या नियंत्रण, प्रकृति आपदा व आतंकवाद आदि जैसे कुरीतियों तथा कई जवलंत विषयों पर अपनी कला का प्रदर्शन कर समाज को नया संदेश देते हैं।

मिला चुका हैं अवार्ड

सैंड आर्टिस्ट मधुरेन्द्र को अपनी कठिन परिश्रम के बदौलत 2019 के लोकसभा चुनाव में निर्वाचन आयोग भारत सरकार का ब्राण्ड अम्बेसडर चुने गए। इसके अलावे राष्ट्रीय अंतराष्ट्रीय स्तर के पुरस्कार जैसे इंटरनेशनल सैंड आर्ट फेस्टिवल अवार्ड, राष्ट्रपति सम्मान, भारत नेपाल मैत्री संबंध सम्मान, फ्रेंडशिप ऑफ इंडिया एंड अमेरिका सम्मान, वैश्विक शान्ति पुरस्कार, बिहार गौरव अवार्ड, विश्वप्रसिद्ध सोनपुर मेला सम्मान, बिहार रत्न, शाहिद सम्मान, कला सम्राट सम्मान, आम्रपाली पुरस्कार, चम्पारण रत्न, वैशाली गणराज्य सम्मान, केसरिया महोत्सव सम्मान, बांका महोत्सव सम्मान, चम्पारण गौरव अवार्ड, बौद्ध महोत्सव सम्मान, वैशाली महोत्सव सम्मान, मिस्टर चम्पारण, राजगीर महोत्सव सम्मान, थावे महोत्सव सम्मान, आईकॉन ऑफ चम्पारण, मगध रत्न अवार्ड व युथ आईकॉन अवार्ड सहित सैकड़ों से ज्यादा पुरस्कार इनके झोली में हैं।

परिस्थितियां और हालात ने दिलायी ख्याति

सैंड आर्टिस्ट मधुरेन्द्र कहते हैं कि मेरा जन्म 5 सितंबर 1994 को बरवाकला गांव ननिहाल में हुआ, वही मेरा पालन पोषण हुआ। हम 5 भाई-बहनों में सबसे बड़े थे। 6-7 साल के उम्र में मैं जब अपने पैतृक गांव लौटा तो वही पिताजी ने मेरा प्रारम्भिक शिक्षा पाने के लिए बाबा नरसिंह के रमना नामक आश्रम में दाखिला करा दिए। आश्रम के सामने एक छोटा तालाब था, उसमें हंस की झुंड रोज तैरती थी।एक दिन मैंने तालाब में तैरते सभी हंस को अपने स्लेट पर पेंसिल से बना दिया। मेरे बनाये हुए इस मनमोहक और सुंदर तस्वीर को देख बाबा नरसिंह ने उस समय ही मेरी कला-प्रतिभा को पहचान ली, खुश होकर मेरी ओर देखते हुए पीठ थपथपाई और बोल उठे यह कलाकार बनेगा और एक दिन अपनी कलाकारी से समाज और देश का सम्मान बढ़ाएगा। फिर घर लौट कर अपने माता-पिता के साथ खेतों में काम करना। बकरी व भैस जैसी पशुधन को चारा देने के साथ उसके रख-रखाव का ख्याल रखना। दही, दुग्ध और माखन बेचना। बाजार व मेलों में झाल मुड़ी और भाजी बेचना। डेली और टोकरी बुनकर बेचना आदि घरेलू कार्य करने के बावजूद भी गांव से 2 किलोमीटर दूर घोड़ासहन शहर में एक छोटे साइन बोर्ड पेंटिंग का स्टूडियो चलना ये सब जिम्मेवारी पूर्वक अपने परिवार को साथ देना मेरा दिनचर्या होती थी। ऐसे थे मेरे संघर्ष। जबकि मेला देखने और घूमने के लिए घर से जेब खर्च के लिए मुझे जो पैसे मिलते थे, उसे हम फिर से वापस लौटा देता था। फिर भी परिवार हमसे खुश नहीं था। इसलिए कि हमें बचपन से ही पढ़ाई से ज्यादा कलाकारी करने में मन लगता था। जिस कारण मेरा पढ़ाई विधिवत नहीं हो पायी। जबकि माँ और पापा कहना था का कि मधुरेन्द्र सरकारी नौकरी करें, लेकिन यह बात मेरे मन के विरुद्ध था।

बोल उठती हैं रेत, जब रेत पर चलती हैं मधुरेन्द्र कि अंगुलियों के जादू

कहा जाता हैं कि “जहां चाह हैं, वही राह” हैं। इसको चरितार्थ करते हैं मधुरेन्द्र। इनमें त्याग और समर्पण इतना कि दिन-रात कठिन परिश्रम कर चाहे चिलचिलाती धूप हो या कपकपाती ठंड का कहर, हर मौसम में भी एक ठोस पहाड़ की भांति अडिग रह अपनी कला साधना में लीन रहतें हैं। और अपनी बेमिसाल कलाकारी का बेहतरीन नमूना पेश कर आये दिन देश- दुनियां को को नया पैगाम देने में जुटे रहतें हैं। जब इनकी अंगुलियों की जादू चलती हैं तो रेत भी बोल उठती हैं।

रेत और मिट्टी को ही बनाया जीविकोपार्जन

मधुरेन्द्र बताते हैं कि मैंने बचपन से मिट्टी में खेलते आया हूं। मिट्टी से खेलना आज भी मेरी आदत हैं।
प्रारम्भिक दौड़ में मैंने अपने खेतों के मेड़ की मिट्टी को काट कर छोटे-छोटे आकर में अपनी दिमागी बातों को मिट्टी में आकर देता था, फिर उसे बड़ा आकर देने के लिए बालू को चुना, जिस पर मुझे कोई भी आकृति को उकेरना आसान लगने लगा और आज बालू की विशाल-विशाल मूर्तियां बनाता हूँ। आज मिट्टी के अलावे बड़े बड़े महापुरुष, राजनेता, साधू-संत, सन्यासी, देवी-देवताओं, शहीदों तथा पूर्वजों की मूर्तियां को तांबा, पितल, अलमुनियम, फाइबर, सीमेंट तथा प्लास्टर ऑफ पेरिस में भी मूर्तियां बनाकर तैयार करता हूं, जो अभी तक लगभग दर्जनों से ज्यादा स्मारकों पर इन धातुओं की मूर्तियां स्थापित हो चुकी हैं। इसके लिए मुझे उचित प्रोत्साहन मिल जाता हैं। वैसे मैं अपनी कला का व्यवसायिक उपयोग नहीं करता हूं।

पदमश्री सुदर्शन पटनायक ने भी माना लोहा

ओड़िसा के कोणार्क में स्थित चंद्रभागा तट पर आयोजित अंतराष्ट्रीय रेत कला उत्सव 2019 में विश्वविख्यात सैंड आर्टिस्ट पदमश्री सुदर्शन पटनायक के सानिध्य में भारत की ओर से बिहार के लाल मशहूर रेत कलाकार मधुरेन्द्र कुमार ने भी श्रीलंका, यूएसए, भूटान, रूस, जापान तथा थाईलैंड सहित दस देशों के साथ प्रतिनिधित्व कर प्रसिद्ध लोकआस्था के महान पर पर्व छठ-पूजा पर की कलाकृति बनाकर कर सभी विदेशी प्रतिभागियों के बीच अपनी कला का प्रदर्शन बिहार की सोंधी मिट्टी की खुशबू का एहसास करा दिया था। जिसे देख ओड़िसा गवर्नर प्रो गणेशी लाल व सुदर्शन पटनायक ने भी मधुरेन्द्र को लोहा माना।

कला का प्रदर्शन

मधुरेन्द्र नेपाल के विश्वप्रसिद्ध गढ़ीमाई मेला, एशिया फेम सोनपुर मेला व सरकारी महोत्सव तथा देश-प्रदेश के विभिन्न सभी छोटे-बड़े शहरों मुंबई, महाराष्ट्र, दिल्ली, गाजियाबाद, पंजाब, भटिंडा, उत्तर प्रदेश, लखनऊ, इलाहाबाद, पश्चिम बंगाल, ओड़िसा, किशनगंज, राजगीर, बोधगया, थावे तथा चम्पारण में भी अपनी कला प्रदर्शन कर चुके हैं।

पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल कलाम ने की थी सराहना

देश पूर्व राष्ट्रपति डॉ एपीजे अब्दुल कलाम ने भी 2012 में मधुरेन्द्र द्वारा बनायीं गयी विकसित देश भारत में विज्ञान के विकास का महत्व पर आधारित कलाकृति को देख प्रशंशा की थी। वही बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और ओड़िसा गवर्नर प्रो गणेशी लाल सहित बड़े-बड़े राजनेताओं व वरीय प्रसाशनिक अधिकारियों तथा देश-विदेश के सैलानियों को भी अपनी कला का लोहा मनवा चुके हैं।

गांव के लोंगो में खुशी का माहौल

इधर मधुरेन्द्र कर इस सफलता पर पूरे देश सहित ग्रामीणों में भी खुशी की लहरें उमड़ पड़ी हैं। लोग इस लाल की भूरि भूरि प्रशंशा करने में जुट गए हैं। चारों ओर चर्चा का विषय बना हुआ है। उक्त अवसर पूर्व विधायक पवन पवन जायसवाल, जिप सीमा देवी, समाजसेवी रामपुकार सिन्हा, प्रभुनारायण, डीएन कुशवाहा, ई मुन्ना कुमार, अरुण पंडित, अमीन रामप्रीत साह, डॉ राजदेव प्रसाद, विमल प्रसाद समेत सैकड़ों लोगों ने मधुरेन्द्र को दुरभाष पर बधाई दी।

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