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Home State Bihar प्रकृति जरुरत पूरी कर सकती है, लालच नहीं- ‘जलपुरुष’ राजेंद्र सिंह

प्रकृति जरुरत पूरी कर सकती है, लालच नहीं- ‘जलपुरुष’ राजेंद्र सिंह

केविवि में ‘ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन’ विषय पर व्याख्यान का आयोजन कुलपति प्रो. संजीव कुमार शर्मा ने की जलपुरुष के कार्यों की सराहना पत्रकार, शिक्षक, अधिकारी-कर्मचारी व बड़ी संख्या में विद्यार्थी रहे मौजूद मोतिहारी: महात्मा गांधी केंद्रीय विश्वविद्यालय में गुरुवार को रैमन मैग्सेसे पुरस्कार विजेता व जलपुरुष के नाम से विख्यात राजेंद्र सिंह ने ‘ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन: जल संरक्षण और प्रबंधन द्वारा अनुकूलन और शमन’ विषय पर व्याख्यान दिया। उन्होंने चित्रों के माध्यम से ही जल, जमीन, सूरज, बादल, पेड़-पौधों व मनुष्यों के आपसी संबंध, ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन आदि को रोचक ढंग से समझाया। वर्ष 1985 की सूखी नदी व पहाड़ी की तुलना में जल संरक्षण के क्षेत्र में काम करने के बाद बदली हुई स्थिति में वर्ष 2000 में पुर्नजीवित नदी और उसके आस-पास की हरियाली की तस्वीर को प्रोजेक्टर की सहायता से दिखाया। आगे कहा कि प्रकृति में हम सब की जरुरत पूरी करने की शक्ति है, लेकिन एक भी आदमी की लालच पूरी करने की शक्ति नहीं है। अपने पूर्व के कार्यों का जिक्र करते हुए कहा कि के. आर. नारायणन जब राष्ट्रपति थे तो हमारे गांव में जाकर उन्होंने हमारी पांचों नदियों को देखा जो पुर्नजीवित हो गयी थीं और वहां गांव में नदी के लिए कार्य करने वालों को सम्मानित किया। जब राष्ट्रपति भवन परिसर स्थित मुगल गार्डन में तालाब बनाने की जरुरत पड़ी तो उसी गांव के अनपढ़ इंजीनियरों को बुलाना पड़ा। इसका मतलब है कि अभी भी भारत के लोकतंत्र में अच्छे लोगों का आदर होता है।
अपने कार्यों और अनुभवों को विद्यार्थियों व शिक्षकों के साथ साझा करते हुए रेगिस्तानी इलाके में जल संरक्षण के बारे में बताया कि जब मैं वहां गया था तो हमारी सारी नदियां सूख गयी थीं, एक बूंद पानी नहीं था, कुएं सूख गये थे। सारा इलाका उजड़ा हुआ था। उस जमाने में गांव की महिलाएं गीत गाती थीं कि बादल तो आते हैं, हर साल मेरे गांव में। बरसते नहीं हैं। वे रुठकर कहां चले जाते हैं, मैं नहीं जानती। वहां जल संरक्षण के बाद हरियाली आयी। बाहर चले गये लोग वापस लौट आए। वहां महिलाएं अब गीत गाती हैं कि बादल आते हैं मेरे गांव में, बरसते हैं वो। इन गीतों के माध्यम से जल संरक्षण के बारे में प्रेरणादायक ढंग से बताया। गांधी जी कार्यों की चर्चा करते हुए कहा कि उनके जीवन में उत्तरदायित्व पहले था और अधिकार की बात बाद में थी। अगर आप ईमानदारी से काम करते हैं तो आप भूल जाते हैं कि आपके पास कितनी डिग्रीयां हैं, आपके काम का सम्मान होता है। काम करने वाले को डिग्री की जरुरत नहीं होती, जो काम नहीं करते उनको डिग्री की जरुरत होती है। इससे पूर्व अपने अध्यक्षीय संबोधन में विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. संजीव कुमार शर्मा ने विश्वविद्यालय परिवार की तरफ से जलपुरुष राजेंद्र सिंह का स्वागत किया। आगे कहा कि राजनीतिक और प्रशासनिक अभिकरणों पर आश्रय रखने के स्थान पर सांस्कृतिक और सामाजिक संस्थाओं के माध्यम से अपनी समस्याओं का समाधान खोजने से संभवतः हमें ज्यादा मदद मिलती है। जल संरक्षण के क्षेत्र में राजेंद्र सिंह के कार्यों की सराहना करते हुए कहा कि अपने कार्यों को राजनीतिक प्रभाव से प्रयत्नपूर्वक बचाते हुए इन्होंने अपनी यात्रा को आगे बढ़ाया है। इस अवसर पर प्रो. आनंद प्रकाश, प्रो. अजय कुमार गुप्ता, डॉ. रफीक उल इस्लाम, डॉ. अभिजीत आदि शिक्षक, जनसंपर्क अधिकारी शेफालिका मिश्रा व बड़ी संख्या में विद्यार्थी उपस्थित रहे।

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