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प्रवासियों का दर्द : सरकार को सोचना होगा कि हम क्यों बने डगरा के बैगन

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बेगूसराय। कोरोना को लेकर जारी लॉकडाउन के कारण काम-धंधा बंद होने से विभिन्न शहरों में फंसे कामगारों को उनके घर तक पहुंचाने के लिए सरकार बड़े पैमाने पर ट्रेन चला रही है। ट्रेन से बड़ी संख्या में प्रवासी लोग आ भी रहे हैं। इसके बावजूद सड़क पर पैदल, साइकिल, रिक्शा, ठेला से आने वालों का हुजूम कम नहीं हो रहा है। बेगूसराय से गुजरने वाली दो राष्ट्रीय उच्च पथ (एनएच-31 और एनएच-28) पर 24 घंटा यह नजारा देखने को मिल रहा है। साइकिल से लोग मुम्बई से असम तक के हजारों किलोमीटर की दूरी भूखे प्यासे रहकर भी तय करने में जुटे हुए हैं। कोई दिल्ली से कटिहार, हरियाणा से पूर्णिया, शिरडी से गेड़ाबाड़ी, मुम्बई से कटिहार जा रहा है तो कोई कोलकाता से छपरा। मालिकों की मनमानी और सरकार की गलत नीति के कारण लोग जान की चिंता किए बगैर जाने को मजबूर हैं। 
निराशा से भरे इन लोगों की बस एक ही चिंता है कि किसी तरह घर पहुंच जाएं। जहां रात होती है, थक जाते हैं वहीं रुक जाते हैं, ना तो बिछावन की चिंता है और ना ही खाने की। हालांकि बेगूसराय की सीमाओं में आते ही उन्हें भोजन और पानी जरूर मिल जाता है। हर भूखे को भोजन कराने के लिए तत्पर साईं की रसोई की टीम लगातार सड़क पर रहकर इन प्रवासियों की सेवा में जुटी हुई है।
प्रवासियों के अलग-अलग दर्द हैं, दर्द के बीच कोई यह नहीं कह रहा है कि अब वह छोड़ चुके शहर में जाएंगे। सभी कहते हैं कि अब गांव में ही रहना है, अपने समाज, गांव और बिहार को प्रगति के पथ पर ले जाना पड़ है ताकि फिर किसी आपदा में ऐसी जलालत नहीं झेलनी पड़े। जिस शहर को हमने बनाया बसाया वह शहर हमें फिर भगा ही नहीं सके। इन्हीं सारी कवायद के बीच कोलकाता से छपरा की ओर जा रहे साइकिल यात्रियों की टोली में शिक्षित नौजवान भी हैं, जो कोलकाता में रहकर मुंशीगिरी का काम करते थे, कंप्यूटर चलाते थे, मालिक के दायां हाथ थे। जब लॉकडाउन हो गया तो मालिक ने ना केवल किनारा कर लिया, बल्कि रहने और खाना देने से भी इनकार कर दिया। जिसके बाद इन लोगों ने टीम बनाई और साइकिल खरीद कर पैदल ही चल दिए अपने गांव की अनंत यात्रा पर।
इसी टोली का एक नौजवान राजेश कहता है प्रवासी डगरा केेे बैगन क्यों बने, यह स्थिति क्यों बनी इसका जवाब सरकार को सोचना चाहिए। हमारे राज्यवासी छात्र, मजदूर, कामगार, पढ़े-लिखे लोग बिहार के बाहर के राज्यों का मुंह क्यों ताकतें हैं? क्यों रुख करते हैं नौजवान उन राज्यों की ओर भी जहां उन्हें हिकारत भरी नजरों से देखा जाता है? बिहार के दो करोड़ से अधिक लोग रोजी-रोटी, सुरक्षा, नौकरी और श्रम बेचने के लिए भारत के विभिन्न राज्यों में हैं। बीए पास मुकेश कहते हैं कि आजादी के बाद डॉ श्रीकृष्ण सिंह ने विकास की नई कहानी गढ़ी थी लेकिन उनके बाद बिहार राजनीतिक षड्यंत्र के जाल और जातीय राजनीति का शिकार होता चला गया। लोग तेजी से भागने लगे, मजदूर क्या पांच-दस बीघा जमीन जोतने वाले शहरों में ठेला खींचते, दुकान का सेल्समैन बने नजर आने लगे। वाचमैन से लेकर सुलभ शौचालय के कर्मी तक में हर जाति, बिरादरी के बिहारी दिखने लगे। आखिर बिहार में रोजगार क्यूं नहीं पनपा। सामाजिक न्याय का खोखला नारा गढ़कर नेता राज कर रहे हैं लेकिन लोग काम की तलाश में बिहार से बाहर नहीं जाए इसके लिए सार्थक दिशा में कोई कदम नहीं उठाए जा रहे हैं।

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