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Home Bihar Bhagalpur हर्बल उत्पादों के कारण औषधीय पौधों की बढ़ी मांग

हर्बल उत्पादों के कारण औषधीय पौधों की बढ़ी मांग

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भागलपुर। जलवायु परिवर्तन के कारण परम्परागत फसलों की गुणवत्ता एवं उपज पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की संभावना को देखते हुए सूबे में गैर परंपरागत फसलों की संभावना की तलाश में वैकल्पिक फसल के रूप में औषधिय पौधों की खेती के प्रति किसानों का रुझान बढ़ रहा है। उल्लेखनीय है कि औषधीय एवं सुगंधित पौधों की खेती में अपार संभावनाएं है। इसे लाभदायक व्यवसाय माना जाता है। विशेष कर औषधि उद्योग के लिए औषधीय पौधे एवं सुगंधित पौधे के बढ़ती मांग को देखते हुए राष्ट्र एवं सूबे की सरकार द्वारा राष्ट्रीय उद्यान मिशन के तहत औषधीय एवं सुगंधित पौधों की खेती पर विशेष बल दिया जा रहा है। औषधीय एवं सुगंधित फसलों की उन्नत खेती के लिए बिहार कृषि विश्वविद्यालय एवं देश की अन्य संस्थानों द्वारा उन्नत तकनीक विकसित किया जा चुका है। इसी कड़ी में औषधीय गुणों से भरपुर कालमेघ गंभीर से गंभीर बीमारियों का इलाज के लिए रामबान माना जाता है। मधुमेह, फाइलेरिया, हृदय रोग, कुष्ठ रोग, श्वांस रोग, खाज खुजली, पीलिया रोग, रक्तशोधक, गले की बीमारी, अनियमित मासिक स्राव, उदर रोग के अलावा अन्य रोगों के लिए काल मेघ की औषधि उत्तम मानी जाती है। काल मेघ की खेती के लिए भूमि दोमट बुलई, दोमट लैटराईट एवं जल निकासी की समुचित व्यवस्था वाली भूमि का चयन कर सकते हैं। इसकी खेती बुआई एवं नर्सरी लगाकर किया जा सकता है। बीज दो से ढाई किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से लगता है। जबकि नर्सरी के माध्यम से लगाए जाने वाले फसलों में चार सौ से पाँच सौ किलो ग्राम प्रति हेक्टेयर लगता है।

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नर्सरी के लिए बीज का बुआई जून माह में किया जाता है एवं रोपाई का कार्य जुलाई के अंतिम सप्ताह एवं अगस्त माह में किया जाता है। रासायनिक खाद की मात्रा ना के बराबर उपयोग किया जाता है। इसमें सड़ी हुई गोबर की खाद प्रति हेक्टेयर 10 से 12 टन तक देना चाहिए। वर्षा ना होने की स्थिति में दो से तीन सिंचाई की आवश्यकता पड़ती है। बुआई से 20 से 25 दिन के बाद निकाई, गुड़ाई का कार्य करना चाहिए। काल मेघ के तैयार फसल की कटाई नवंबर दिसंबर महीने में किया जाता है। औसतन सूखे पौधे के उपज लगभग 25 से 30 क्विंटल प्रति हेक्टेयर होता है। बीएयू के द्वारा बीज का चयनित प्रभेद सिम मेघा है। इसके अलावा भी अन्य प्रकार का बीज है।

 उद्यान विशेषज्ञ डॉ ममता कुमारी ने बताया कि जलवायु परिवर्तन के कारण परम्परागत फसलों की गुणवत्ता एवं उपज पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की संभावना को देखते हुए गैर परंपरागत फसलों की संभावना की तलाश में वैकल्पिक फसल के रूप में औषधिय पौधों की खेती करना चाहिए। इससे किसानों को ज्यादा फायदा होगा। खासकर कोरोना संक्रमण को लेकर औषधि का महत्व और बढ गया है। औषधिय पौधे की खेती होनी चाहिए। कालमेघ के अलावा औषधियों से भरपुर अश्वगंधा, सतावर, ऐलोवेरा, स्टीविया, मेन्था, लेमन घास, खस सहित अन्य औषधि है, जो गंभीर से गंभीर और असाध्य रोगों के ईलाज के अचूक औषधि माना जाता है। 
वरीय वैज्ञानिक डॉ विनोद कुमार ने बताया कि भागलपुर जिले में औषधीय पौधों के उत्पादन की असीम संभावनाएं हैं। वर्तमान समय में लोग हर्बल उत्पादों का बहुत ज्यादा मात्रा में उपयोग करने लगे हैं। जिले के फिरपैंती और कहलगांव के पठारी क्षेत्र कालमेघ की खेती के लिए उपयुक्त है। नवगछिया के क्षेत्र में खस और मेंथा की खेती की जा सकती है। श्याम तुलसी की भी मांग काफी है। नवगछिया के क्षेत्र में केले के किसान केले के खेत में बीच-बीच में श्याम तुलसी की खेती कर सकते हैं। उन्होंने बताया कि बिहार कृषि विश्वविद्यालय सबौर ऐसे औषधीय पौधों का उत्पादन करने वाले किसानों को तकनीकी जानकारी मुहैया करा रही है। 
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