महागठबंधन के शीर्ष नेता सवालों के घेरे में, पार्टी नेताओं के निष्कासन के लिए दोषी कौन ?

सागर सूरज:

मोतिहारी। यू तो सभी राजनीतिक पार्टियाँ एक सी है। इनमें से राष्ट्रीय जनता दल भी एक अजीब पार्टी है। इस पार्टी को ना तो सिद्धांतों से कोई नाता है और ना ही नियमों से कोई अपनापन। अगर आप राजद के विधायक भी है या किसी भी वरीय पद पर है तो भी आप पार्टी विरोधी कार्य कर सकते है। आप चाहे तो चुनाव में दुसरे पार्टी के प्रत्याशियों को भी खुलेआम समर्थन कर सकते है या पार्टी के प्रत्याशी के विरुद्ध जाकर आप चुनाव भी लड़ सकते है,  बशर्ते आपको ये मानकर चलना पड़ेगा की आपको कागज में छह: साल के लिए पार्टी से निष्कासित होना होगा और हाँ, एक साल में पुनः पार्टी में आपको वापस भी ले लिया जायेगा। बस सावधानी ये रहे कि सिर्फ इस दरम्यान आपको किसी दुसरे पार्टी को ज्वाइन नहीं करना होगा। इस बीच भले ही आप निष्कासित है फिर भी पार्टी के सभी मीटिंग में जाते- आते रहिये पार्टी नेताओ से मिलते जुलते रहें। बैनर व पोस्टरों आदि के आलावा सोशल मिडिया पर खूब राजद के नेता के रूप में अपना नाम भी छपवाते रहिये, आप अपनी मर्जी से अपने गाडियों पर नेम प्लेट भी लगा लगा सकते हैं, आपको ना तो कोई रोकेगा और ना ही टोकेगा। बस आपको विधिवत रूप से पार्टी में वापस आने को लेकर एक वर्ष तक इंतज़ार करना पड़ेगा उसके बाद पुनः मुसिको भव:।

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पार्टी के एक वरीय नेता ने नाम नही छापने के शर्त बताया है कि पिछले विधान सभा चुनाव में भी ऐसा ही कुछ खेल खेला गया। केसरिया के राजद के विधायक राजेश कुशवाहा, हरसिद्धि के राजद विधायक राजेंद्र कुमार राम, चिरैया के पूर्व राजद विधायक लक्ष्मी नारायण यादव, रक्सौल के राजद नेता सुरेश यादव, हरसिद्धि युवा राजद के प्रखंड अध्यक्ष संजय यादव और तुरकौलिया प्रखंड के राजद अध्यक्ष राजदेव यादव आदि को पार्टी विरोधी गतिविधियों में शामिल रहने के आरोप में पार्टी से छह: वर्ष के लिए निष्काषित कर दिया गया। निष्कासन हेतु अनुशंसा पूर्वी चंपारण के राजद जिलाध्यक्ष सुरेश यादव ने किया था, अनुशंसा पत्र में पार्टी में इनलोगों को वापस लाने के शर्तों की चर्चा नहीं थी।

लक्ष्मी नारायण यादव और राजेश कुशवाहा पर जहाँ पार्टी का टिकट नहीं मिलने पर अपने-अपने विधान सभा क्षेत्रों से निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ने का आरोप था। वहीं राजेंद्र कुमार राम एवं अन्य पर भीतरघात का आरोप लगाते हुये इन लोगों को राजद से निष्कासित कर दिया गया था।

पार्टी से निष्कासन के बाद भी ये लोग सामान्य रूप से पार्टी का कार्य करते रहे एवं पार्टी नेता के रूप में बैनर व पोस्टरों पर अपनी तस्वीर भी दिखाते रहे। 

इस बावत जब जिला राजद अध्यक्ष सुरेश यादव से पूछा गया तो उन्होंने भी वही पक्ष रखा की इनके व्यवहार एक वर्ष तक सही थे इसलिए इनको पुनः पार्टी में शामिल कर लिया गया।

अब सवाल ये है की जो लोग पार्टी के टिकट से वंचित रहने के बाद भी पार्टी के विरुद्ध नहीं गए और पार्टी के प्रत्याशियों को जिताने को लेकर जी तोड़ मेहनत करते रहे, वैसे लोगो की नाराजगी जायज है। आस्थावान पार्टी कार्यकर्ताओं के लिए ऐसे प्रयास क्या महज़ कार्यकर्ताओं को बेवकूफ बनाने का प्रयास नहीं है तो और क्या है? क्या अध्यक्ष सुरेश यादव जिनके अनुसंशा पर इनलोगों को पार्टी से निष्कासित किया गया था क्या इनलोगों को बीच में ही पार्टी में पुनः शामिल करने को लेकर सुरेश यादव की अनुशंसा मांगी गयी थी? ऐसे कई सवाल फिजाओं में तैर रहे है जिसका जवाब पार्टी के समर्पित कार्यकर्ता और नेता जानना चाहते है। अब सवाल उठता है कि जिलाध्यक्ष ने पद का दुरूपयोग कर दुर्भावना 

 से ग्रस्त हो कर अनुशंसा किया या अगर इन लोगों को पार्टी में शामिल करने मे जिलाध्यक्ष सुरेश यादव की भूमिका नहीं थी तो सुरेश यादव अब तक अध्यक्ष पद पर बने क्यों हैं। 

पूर्वी चम्पारण जिले में बारह विधानसभा क्षेत्रों में महज तीन सीट हीं महागठबंधन को मिले ही जबकि 9 सीटों पर एनडीए काबिज है, तो अब सवाल ये उठता है कि क्या जिले में महागठबंधन के इस दुर्गति के लिए महागठबंधन में शामिल दलों के जिलाध्यक्ष समेत पार्टी के शीर्ष नेता दोषी नहीं है?

हालाँकि इस मामले में भाजपा भी कुछ कम नहीं रही है। पूर्वी चंपारण में तो नहीं बल्कि गोपालगंज के पार्टी के एक एमएलसी व वरीय भाजपा नेता टुन्ना पाण्डेय ने तो एक मामले में बिहार के सीएम नितीश कुमार को जेल ही भेजने की मांग कर डाली। पार्टी ने उन्हें भी निष्कासित किया लेकिन बाद में पार्टी के एक वर्चुअल मीटिंग में भाग लेते देखे गए। जिसका फोटो सोशल मिडिया में खूब सुर्ख़ियों में रही।

 

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