मोतिहारी। भारत–नेपाल सीमा से सटा पूर्वी चंपारण जिला लंबे समय से चरस, हेरोइन, गांजा और हाशिश जैसे खतरनाक मादक पदार्थों की तस्करी का अहम रास्ता माना जाता रहा है। समय–समय पर पुलिस की कार्रवाई में बड़ी मात्रा में नशे की खेप बरामद होती है, लेकिन कमजोर अनुसंधान और कथित मिलीभगत के कारण कई मामलों में तस्कर अदालत से राहत पा जाते हैं। ऐसे घटनाक्रम न केवल पुलिस की कार्यशैली पर सवाल उठाते हैं, बल्कि सीमा क्षेत्र की सुरक्षा व्यवस्था पर भी गंभीर हमला करते नजर आते हैं।
ताजा मामला सुगौली थाना क्षेत्र का है, जहां 21 मार्च को टोल प्लाजा और बंगरी गांव के पास से करीब 80 किलो चरस और गांजा बरामद किया गया था। उस समय तत्कालीन एसपी कांतिश मिश्रा ने तस्करों के साथ प्रेस कॉन्फ्रेंस कर इसे बड़ी सफलता बताया था। लेकिन अदालत में सुनवाई के दौरान अनुसंधान में गंभीर खामियां सामने आने के बाद तीनों आरोपियों को रिहा कर दिया गया।

बताया जाता है कि सुगौली के तत्कालीन थानाध्यक्ष मुन्ना कुमार ने बरामदगी के आधार पर प्राथमिकी दर्ज की थी और मामले की जांच पुलिस अधिकारी शंभु साह को सौंपी गई थी। यहीं से लापरवाही या साजिश के आरोपों की शुरुआत होती है। पुलिस ने 90 दिन से पहले चार्जशीट दाखिल तो कर दी, लेकिन जब्ती सूची तैयार करने वाले मजिस्ट्रेट का बयान केस डायरी में दर्ज नहीं किया गया। इसके अलावा दो अलग-अलग जगहों से बरामदगी होने के बावजूद सिर्फ एक जगह का सैंपल ही जांच के लिए भेजा गया। इन कमियों के आधार पर अदालत ने आरोपियों को “बेनिफिट ऑफ डाउट” देते हुए रिहा कर दिया।
सुगौली में इससे पहले भी एक चौंकाने वाला मामला सामने आ चुका है, जब रेलवे स्टेशन से बरामद करीब 24 किलो चरस अदालत पहुंचने तक ईंट में तब्दील पाया गया था। उस प्रकरण में जब्ती सूची बनाने वाले तत्कालीन सीओ कुंदन कुमार समेत जीआरपी और आरपीएफ के कई अधिकारियों पर आर्थिक अपराध का मामला दर्ज किया गया था।
इसी तरह रक्सौल के एक मामले में 11 किलो चरस बरामदगी के बावजूद साक्ष्य के अभाव में उच्च न्यायालय से आरोपियों को जमानत मिल गई थी। उस समय पुलिस पर निर्दोष लोगों को सड़क से उठाकर फंसाने तक के आरोप लगे थे।
लगातार सामने आ रहे ऐसे मामलों ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या सीमा क्षेत्र में तस्करों को वर्दी की छत्रछाया मिल रही है। हालांकि, एसपी स्वर्ण प्रभात ने पूरे मामले को गंभीरता से लेते हुए तीन सदस्यीय जांच टीम गठित की है।
टीम एक सप्ताह के भीतर रिपोर्ट देगी, जिसके बाद यह साफ हो सकेगा कि 80 किलो चरस बरामदगी मामले में हुई चूक महज लापरवाही थी या इसके पीछे कोई बड़ा गठजोड़ काम कर रहा था।
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