सिकरहना एसडीपीओ कानून के सिकंजे मे, न्यायिक प्रक्रिया में हस्तक्षेप पर कोर्ट ने लिया संज्ञान
Reported By SAGAR SURAJ
Updated By RAKESH KUMAR
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मोतिहारी: ढाका(सिकरहना) स्थित एसीजेएम विवेक कुमार मिश्रा की अदालत ने एक महत्वपूर्ण मामले में कड़ा रुख अपनाते हुए एसडीपीओ, सिकरहना उदय शंकर के आचरण पर गंभीर टिप्पणी की है।
एक मामले मे पारित आदेश में अदालत ने स्पष्ट रूप से कहा है कि संबंधित पुलिस पदाधिकारी द्वारा न्यायिक प्रक्रिया में हस्तक्षेप और कानून के निर्धारित प्रावधानों की अवहेलना प्रथम दृष्टया सामने आयी है।

अदालत के आदेश के अनुसार, पचपकड़ी थाना कांड संख्या 153/2025 में एक आर्म्स लाइसेंस को जांच अधिकारी द्वारा जब्त कर जप्ती सूची बना दी गयी, जिससे वह न्यायिक अभिरक्षा में आ गया।
इसके बावजूद एसडीपीओ उदय शंकर द्वारा लिखित आदेश के माध्यम से जांच अधिकारी को बिना न्यायालय की अनुमति के उक्त लाइसेंस को रिलीज करने का निर्देश दिया गया। अदालत ने इसे न केवल अधिकारों का दुरुपयोग माना, बल्कि अधीनस्थ अधिकारियों पर अवैध दबाव बनाने का प्रयास भी बताया।
मामले में अदालत ने एसडीपीओ से स्पष्टीकरण भी मांगा था, लेकिन पर्याप्त अवसर दिए जाने के बावजूद कोई संतोषजनक जवाब प्रस्तुत नहीं किया गया।
इतना ही नहीं, 24 फरवरी 2026 को अदालत द्वारा एसडीपीओ सिकरहना और पुलिस अधीक्षक, मोतिहारी से विस्तृत रिपोर्ट भी तलब की गई थी, लेकिन अब तक कोई तथ्यात्मक रिपोर्ट अदालत को प्राप्त नहीं हुई है।
अदालत ने अपने आदेश में कहा कि एसडीपीओ का यह आचरण न्यायिक प्रक्रिया में अनावश्यक हस्तक्षेप और विधि द्वारा निर्धारित प्रक्रिया के विपरीत है। प्रथम दृष्टया यह भी प्रतीत होता है कि उन्होंने एक लोक सेवक के रूप में अपने कर्तव्यों का निर्वहन करते हुए कानून के निर्देशों की जानबूझकर अवहेलना की, जिससे न्याय प्रशासन प्रभावित हुआ।
कोर्ट ने यह भी उल्लेख किया कि उदय शंकर का यह कृत्य भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 199(b) एवं धारा 208 के तहत दंडनीय अपराध की श्रेणी में आता है।
पूर्व मे जुड़िसियल मजिस्ट्रेट विवेक कुमार उपाध्याय ने इस मामले मे स्वतः संज्ञान लिया था. समन के बाद भी एसडीपीओ कोर्ट मे उपस्थित नहीं हो सके थे.
संज्ञान की धाराओं के तहत लोक सेवक द्वारा जानबूझकर कानून की अवज्ञा करना और न्यायालय के आदेश की अनुपालना में अनुपस्थित रहना गंभीर अपराध माना जाता है। अधिकारी को जेल भी जाना पड़ सकता है.
साथ ही, सर्वोच्च न्यायालय के विभिन्न निर्णयों का हवाला देते हुए अदालत ने कहा कि यदि कोई लोक सेवक अपने अधिकारों का दुरुपयोग करता है और उसका कृत्य उसके आधिकारिक कर्तव्य से संबंधित नहीं है, तो उसे कानूनी संरक्षण प्राप्त नहीं होता।
इस पूरे मामले ने प्रशासनिक कार्यप्रणाली और जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि आगे इस मामले में क्या कानूनी कार्रवाई होती है और संबंधित अधिकारी पर क्या कदम उठाए जाते हैं।
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